उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में आज मुस्लिम समुदाय में प्रचलित एक बार में ‘तीन तलाक’ कह कर तलाक देने की 1400 साल पुरानी प्रथा खत्म करते हुये इसे पवित्र कुरान के सिद्धांतों के खिलाफ और इससे इस्लामिक शरिया कानून का उल्लंघन करने सहित अनेक आधारों पर निरस्त कर दिया।

पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने , 3:2 के बहुमत से जिसमें प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर अल्पमत में थे, ने एक पंक्ति के आदेश में कहा, ‘‘3:2 के बहुमत में रिकार्ड की गयी अलग अलग राय के मद्देनजर तलाक-ए-बिद्दत् (तीन तलाक) की प्रथा निरस्त की जाती है।’’ संविधान पीठ के 395 पेज के फैसले मे तीन अलग अलग निर्णय आये। इनमें से बहुमत के लिये लिखने वाले न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन प्रधान न्यायाधीश और न्यायमूर्ति एस ए नजीर के अल्पमत के इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं थे कि ‘तीन तलाक’ धार्मिक प्रथा का हिस्सा है और सरकार को इसमें दखल देते हुये एक कानून बनाना चाहिए।

न्यायमूर्ति जोसेफ, न्यायमूर्ति नरीमन और न्यायमूर्ति उदय यू ललित ने इस मुद्दे पर प्रधान न्यायाधीश और न्यायमूर्ति नजीर से स्पष्ट रूप से असहमति व्यक्त की कि क्या तीन तलाक इस्लाम का मूलभूत आधार है।

सरकार, राजनीतिक दलों, कार्यकर्ताओं और याचिकाकर्ताओं ने तत्काल ही इस निर्णय का स्वागत किया। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे ‘ऐतिहासिक’ बताते हुये कहा कि इसने मुस्लिम महिलाओं को बराबर का हक प्रदान किया है।

विधिवेत्ता सोली सोराबजी ने कहा, ‘‘यह प्रगतिशील फैसला है जिसने महिलाओं के अधिकारों को संरक्षण दिया है और अब कोई भी मुस्लिम व्यक्ति इस तरीके से अपनी पत्नी को तलाक नहीं दे सकेगा।’’ तीन तलाक की प्रथा निरस्त होने के बाद अब, सुन्नी मुस्लिम, जिनमे तीन तलाक की प्रथा प्रचलित थी, इस तरीके का इस्तेमाल नहीं कर सकेगे क्योंकि शुरू में ही यह गैरकानूनी होगा।

शीर्ष अदालत द्वारा तलाक ए बिद्दत या एकबारगी तीन तलाक कह कर तलाक देने की प्रथा निरस्त किये जाने के बाद अब इनके पास तलाक लेने के दो ही तरीके-तलाक हसन और तलाक अहसान ही उपलब्ध हैं।

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