रितुराज राजावत: अनपढ़ों के हाथ में है जनता का भविष्य मजबूर आईएएस आईपीएस करतें हैं नेताओं की जी हुजूरी बिना डिग्री वाले चाला रहें हैं सरकार खुद को बतलातें हैं अहम सर्वोपरी*
*- अपराधी भी बन जाता है बड़ा नेता ना पढ़ाई का होता है कोई महत्व ना लिखाई की होती है जरूरत*
*- अनपढ़ों को नही मिलती चपरासी की नोकरी रोडों पर भटकता है पढ़ा लिखा भारत*
*- जेल में बंद अपराधी लड़ लेतें हैं चुनाव नोकरी पाने के लिए शिक्षितों को गुजना पड़ता है जांच की अग्निपरीक्षा से*
*- आपराधी से नेता बनने वालों  को मिलती है दुनिया भर की सुविधाएं बेबस संविधान ताकता रह जाता है मुँह*
*- गरीब भारत के मजबूर संविधान  का है एक कडुवा सच ये भी बिना डिग्री वाले अपराधी करतें हैं जनता का प्रितिनिधित्व*
वो दिन बीत गए जब पढ़े लिखे व्यक्ति नेता बनकर भारत को नए आयाम तक पहुचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे । सुभाषचंद्र बोस लाल लाजपत राय महात्मा गाँधी और ना जाने कितने नेता पूर्व में ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपनी बौद्धिक सोंच और ज्ञान के सागर को आधार बनाकर देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्ति दिलाने में अहम योगदान दिया था । पूर्व में नेता वही बनता था जिसके ह्रदय में देश के लिए असीम प्रेम और जनता के प्रति जिम्मेदारी का भाव होता था । देश को प्रगति के पथ पर ले जाने वाले स्वंम के विकास को भूलकर  देश की जनता को विकासशील बनाने का उद्देश्य लेकर नेतागिरी के पथ पर अग्रसर रहते थे । संविधान का निर्माण तब पूर्णरूप से हो चुका था परन्तु कम पढ़ी लिखी जनता को उस वख्त देश के संविधान का सम्पूर्ण ज्ञान नही था । हालांकि संविधान के निर्माण में मुख्य भूमिका अदा करने वालों  ने भी कभी इस बात का आकलन नही किया होगा कि जिस संविधान का उन्होंने निर्माण किया है वो भविष्य में अपराधियों के लिए संजीवनी बन जायेगा । सरकारी कार्यप्रणाली का हिस्सा बनने के लिए अर्थात नौकरी पाने के लिए अलग अलग दिशानिर्देश इसी संविधान में अंकित किये गए थे । परन्तु नेता बनने के लिए चुनाव को छोड़कर कोई भी ऐसा दिशानिर्देश नही दिया गया जिससे ये माना जा सके कि जनता का प्रतिनिधित्व कौन से व्यक्ति कर सकतें हैं और कौन से नही । चपरासी की नौकरी पाने के लिए भी नियमावली बनाई गई थी जिसमे शिक्षा सहित शारीरिक विक्षिप्तता का भी ब्यौरा देना महत्वपूर्ण किया गया था । आपराधिक मुकदमें वालों को सरकारी नॉकरी से पूरी तरह से वंचित कर दिया गया था और नेतागिरी करने वाले पूर्व के अपराधियों के प्रति विपरीत रवैया अपना कर उन्हें चुनाव लड़ने में इस तरह की जांचों से मुक्ति दे दी गयी । हालातों का दौर चलता गया और अपराध की दुनिया में शौहरत कमाने वाले जनता के प्रतिनिधि बन बैठे । चुनाव के मानक भी शून्य रक्खे गए और कल के अपराधी आज के नेता कहलाने लगे । ना ही चुनाव के कोई विशेष मानक बनाये गए और ना ही आपराधिक मुकदमें के दोषियों को चुनाव ना लड़ पाने वाली बेड़ियों से जकड़ा गया । आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहकर काली कमाई करने वालों को जेल की सलाखों के पीछे रहकर भी चुनाव लड़ने की छूट भारतीय संविधान द्वारा दी गयी । काला चोला उतारकर खद्दर के कुर्ते को धारण करने वाले अनपढ़ अब विधानसभा और संसदभवन तक अपनी पहुच बना चुकें हैं । अँगूठाटेकों का सुनहरा समय चल रहा है और ज्यादा पढ़े लिखे सरकारी कर्मचारी आज मजबूरीवश इनकी जी हुजूरी करके अपना बुरा समय एक एक दिन करके काटने पर मजबूर हैं । सरकारी नौकरी के पद पर नियुक्ति डिग्री के आधार पर दी जाती है परंतु बड़ा नेता बनने के लिए किसी भी प्रकार की  डिग्री महत्वपूर्ण नही मानी गयी है । इस बात से कोई फर्क नही पड़ता है कि आप कितने बड़े अपराधी पूर्व में रह चुके हैं या फिर अभी भी हैं । चुनाव एक सीधा और सरल रास्ता बनाया गया है जिसे देशी दारू और विदेशी मुर्गे के दम पर जीता जा सकता है । पढ़े लिखे युवा आज नौकरी की तलाश में डर डर की ठोकरे खाते घूमतें है और अनपढ़ अपराधियों से नेतागिरी का बाजार सज चुका है । नेता बनते ही दुनियाभर के ऐशो आराम से इनकी जिंदगी गुलजार हो जाती है और मजबूर भारत का बेबस संविधान बीच रास्ते खड़ा रहकर इनका मुह ताकता रह जाता है । जनता का प्रतिनिधित्व आजकी तारीख में अधिकांश वो नेता कर रहें हैं जो कभी पुलिस को देखकर अपने अपराधों के चलते गदबद लगा दिया करते थे । अनपढ़ सरकार के सारथी बन चुके हैं और ऑर्डर का चाबुक सरकारी हुक्मरानों पर चालाया जा रहा है । शिक्षित युवा सड़कों पर नौकरी की तलाश करते घूम रहे हैं और अनपढ़ों ने देश के भविष्य की जिम्मेदारी को अपने कंधों में उठा रखा है इसी को कहतें हैं कि सात खून माफ

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