मुद्दा जो जरुरी है में आज- कुकरी प्रथा
तथ्य व आलेख संतोष "प्यासा"
शादी के बाद नई नवेली दुल्हन की ससुराल में पहली रात. क्या सोंच रही होगी अकेले? ज्यादा कुछ नहीं, बस अपने आने वाले भविष्य के सुनहले ख्यालों को सजाती हुई, बिना बात के चहरे पर एक भीनी मुस्कान, खोयी खोयी सी. अचानक एक आहत से उसकी तन्द्रा टूटती है. और सामने उसका पति हाथ में सफ़ेद धागे का एक गुच्छा लिए दिखाई देता है.

लड़की घबरा जाती है. क्यूंकि वो जानती है कि उसका पति धागे से जांचेगा कि वो कुंवारी है या नहीं. लड़की सिसकियाँ लेती रहती है. पति बाहर आकर चिल्लाते हुए कहता है. ये तो शादी से पहली ही ****** चुकी है. लड़के के घर वाले लड़की को घेर लेते है, और पूंछते है कि "बता कौन है वो जिसके साथ तूने मुँह काला किया है. बेचारी लड़की डरी-सहमी कहती है कि उसने ऐसा कुछ नहीं किया. लेकिन उसकी एक नहीं सुनी जाती. ससुराल वाले बेचारी लड़की को मारते पीटते है. और दबाव बनाते है कि वो (लड़की) पंचायत के सामने मान ले कि उसने शादी से पहले किसी और के साथ सबंध बनाये है. रोज की मारपीट के आगे बेचारी (लड़की) को मजबूरन ससुराल वालो द्वारा थोपा गया आरोप स्वीकार्य कर लेती है. इसके बाद ससुराल पक्ष द्वारा लड़की के माता पिता के ऊपर दबाव बनाने लगते हैं. और लड़की को प्रताड़ित करने का सिलसिला तब तक जारी रखते है जबतक की ससुराल पक्ष को लड़की के पिता (घरवालों) से (लड़की ) वर्जिन या कुंवारी न होने की भरपाई के रूप में मोटी रकम नहीं मिल जाती.
मोटी रकम मिल जाने के बाद बहू सबको प्यारी और संस्कारी लगने लगती है.
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ये कोई कहानी या फ़िल्मी सीन नहीं है, यहाँ हम बात कर रहे हैं राजस्थान की जहाँ लगभग 100 साल से भी ज्यादा समय से सांसी समुदाय द्वारा कुकरी नाम की वाहियात प्रथा चल रही है.
जब गहनता से इस सन्दर्भ में जब गहन जाँच पड़ताल और जानकारी इकट्ठी की गयी तो पता चला कि ऐसी कोई प्रथा थी ही नहीं. बात कुछ यूँ ही कि जब हिन्दुस्तान में विदेशी घुसे तो वे लड़कियों और महिलाओं को बलपूर्वक उठाकर लेजाते थे, और फिर बलात्कार करके फेंक कर चले जाते थे. उस समय राजपूत अपने घर आई नवी नवेली दुल्हन के कुंवारी होने कि पुष्टि के लिए धागे का इस्तेमाल करते थे. दरअसल राजपूत ये जानने के लिए ऐसा करते कि कंही उनकी बहू का विदेशियों द्वारा बलात्कार तो नहीं हुआ.
बहरहाल समय के साथ राजपूतों ने इस कुप्रथा को त्याग दिया लेकिन सांसी समुदाय ने इस कुप्रथा को अपना लिया. और कुकरी प्रथा के नाम पर स्त्री के वर्चस्व को तार तार करने एवं मोटी रकम वसूलने के लिए अभी तक इस कुप्रथा को आगे बढ़ा रहे हैं.
गहनता से पड़ताल करने के बाद पता चला कि ज्यादातर सांसी समुदाय कि मानसिकता रहती है कि उनकी बहू वर्जिन न हो ताकि उनको मोटी रकम हथियाने का मौका मिल जाये.
ये कुप्रथा १०० सालों से बरक़रार है. अगर देखा जाय तो ये प्रथा दहेज़ वसूलने का अमानवीय तरीका मात्र है.
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इतना ही नहीं पंचायत भी लड़के का पक्ष लेता है. ज्ञात हो कि पंचायत कि एक बैठक में औसतन 20 -25 हजार रुपये खर्च होते है. जिसकी भरपाई लड़की के परिवार को हो करनी होती है. अब आप ही सोंचिये आमतौर पर शादी के बाद लड़कीपक्ष के पास पैसों कि तंगी रहती है. ऐसे ने पंचायत का खर्चा और फिर मुआवजे कि रकम. कुकरी प्रथा लड़की के शारीरिक, मानसिक शोषण के साथ साथ उसके माँ बाप का आर्थिक शोषण करने का घटिया तरीका है.
जब लड़की नहीं स्वीकारती आरोप.
कभी कभी कुछ लड़कियां अपने आत्म सम्मान के खातिर शोषण सहने के बाद भी ससुराल पक्ष द्वारा थोपे जा रहे झूठे आरोप को नहीं स्वीकारतीं तो पंचायत द्वारा विर्जिनिटी टेस्टिंग के लिए दो तरह का तुगलकी फरमान जारी किया जाता है.
१.गर्म लोहे कि अग्नि परीक्षा:
गर्म लाल लोहे का 2 किलो का टुकड़ा. लड़की को अपने हाथों पर रखकर चलना पड़ता है. लोहे और हाथों के बीच में गुंथा हुआ थोड़ा सा आटा और पान के 7 पत्ते रख दिए जाते हैं. नियम सिर्फ ये है कि अगर लड़की वर्जिन है तो उसका हाथ नहीं जलेगा. अगर जल गया तो उसकी पिटाई होगी और उसके परिवार को मुआवजे में लाखों रुपए देने पड़ेंगे. अगर हाथ नहीं जला, तो लड़के के घर वाले पैसे देंगे. ज्यादातर मामलों में लोहा वजनदार होने कि वजह से ज्यादा ताप का हो जाता है, ज्यादा ताप होने से हाथ जलना स्वाभाविक सी बात है.
२ .जल परिक्षण:
इस परिक्षण में लड़की अब पानी की दीज टेस्ट देती है . लड़की को किसी नदी या तालाब में डुबकी लगा कर, सांस रोककर रहना है. एक आदमी जो ना लड़के वालों की तरफ से है, ना लड़की वालों की तरफ से, वो ज़मीन पर 100 कदम चलेगा. मान लो उसको लगेंगे 120 सेकंड. तब तक लड़की को अपनी सांस रोके पानी के अन्दर ही रहना होगा.
बड़े शर्म कि बात है कि जिस देश में कहा जाता है " यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" (जहाँ नारी कि पूजा होती है, वहां देवता निवास करते है.). वहीँ पुरुष प्रधान मानसिकता के कारण स्त्री जाती को तरह तरह कि मानसिक शारीरिक यातनाओं को झेलना पड़ता है. ताज्जुब कि बात तो यह है कि इन मामलों में पुलिस भी यह कह कर पल्ला झाड़ लेती है कि ये "निजी समुदाव कि परंपरा है."
बड़ा प्रश्न यह है कि, सीता से लेकर आजतक केवल नारियों को ही अपनी पवित्रता क्यों सिद्ध करनी पड़ती है? क्यों नहीं कोई पुरुष के कुंवारेपन जाँच करता? क्यों हमेशा स्त्री को अपमान और परम्पराओं का दंश झेलना पड़ता है?
टिप्पणी: न्यूज़ मिरर ने एक मुहीम छेड़ी है, हम समाज में व्याप्य कुप्रथाओं, कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाएंगे, एवं सरकार और प्रशाशन का ध्यान आकर्षित कर इन घटिया रीतियों का हल निकालेंगे. अगर आप के आस-पास (या आपको ऐसी प्रथाओं की कोई जानकारी है ) भी कोई ऐसी अमानवीय प्रथा या रिवाज चलन में है, तो हमसे संपर्क करें. एवं मानवता के इस पुनीत कार्य में सहयोगी बने.
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